रात सुकूँ है दिल को बेकरार न कर, बिना सोचे किसी पर ऐतबार न कर.!

भरे बाजार से अक्सर मैं खाली हाथ आया हूँ, कभी ख्वाहिश नहीं होती कभी पैसे नहीं होते।

तलब करें तो मैं अपनी आँखें भी उन्हें दे दूँ, मगर ये लोग मेरी आँखों के ख्वाब माँगते हैं।

बेगुनाह कोई नहीं गुनाह सबके राज़ होते हैं, किसी के छुप जाते हैं, किसी के छप जाते हैं।

शहर में सबको कहाँ मिलती है रोने की जगह, अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही।

मंजिलें होती हैं कुछ ऐसी कि जिनकी राह में, दम निकल जाए अगर तो फख्र की ही बात है।

मैं एक शाम जो रोशन दीया उठा लाया, तमाम शहर कहीं से हवा उठा लाया।

नजरों में दोस्तों की जो इतना खराब है, उसका कसूर ये है कि वो कामयाब है।